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Wednesday, 19 December 2012

पूजी जाती है "कामाख्या"



आज आंसू निकल आये उस लड़की की स्थिति सुनकर,बहुत हिम्मत जुटाकर कुछ शब्द जोड़े हैं .... भरे गले से निकली आवाज़ ..... एक पुकार .....
सोचती हूँ .. आप सब समझेंगे ......


नहीं चाहती!!
मैं नहीं चाहती अब ये,
कि  ये घाव भरे कभी।।
इस पर नमक छिड़कते रहना ज़रूरी है,
याद दिलाने के लिए तुम्हे,
कि मानवता को रोंदा है आज तुमने,
अपने पैरों तले, ऐ पुरुष!!

राक्षसों को मात दी है,
सारी सीमाएं लांघ दी हैं,
ये कैसा पुरुषत्व है तुम्हारा????
ये कैसा अहम् है तुम्हारा??????
जिसने तुमको जन्म दिया है,
उस नारी-जाति की आत्मा को चीर डाला??????

क्यूँ !!
अगर गुड़ियों के साथ खेली है वो,
तो इसका मतलब ये तो नहीं ,
कि वो भी एक गुडिया है …. !!

मौन,
बेजान !!

अरे!!
ऐसा कैसे समझ लिया तुमने ?????
वो तो शक्ति है,
सहनशीलता की मूर्ति है,
सृष्टि की ऐसी कल्पना है,
जिसके बिना तुम्हारा अस्तित्व शून्य है !!


  
चेतावनी तुमको है देनी,
पूजी जाती है "कामाख्या"* ……            
उसके एक रूप को,
जिस क्रूरता से है रोंदा गया,
कुछ तो वेदना हुयी होगी उसे भी!!!!! 


कामना है आज मेरी ....
जागृत हो जाए उसी शक्तिपीठ से आज,
बन के चंडी कर दे पापियों का संहार  .....!!

ऐसा दुस्साहस न कर पाए कोई,
कोई और "दामिनी" न जन्म ले अब,
कोई साँसें अब यूँ न बिखरें ,
कोई और नारीत्व न  कुचला जाए ,
कोई अबला अब न सिसके !!

 *(51 अंगों में से एक अंग सती का ......-योनि)

ॐ एं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे !!





Monday, 17 December 2012

"गोभी के परांठे"



कल बनाते वक़्त "गोभी के परांठे" ..............

पता था मुझे .... हमेशा की तरह तुम कहोगे आज भी ...!!
कि उन परांठों का स्वाद भुलाये नहीं भूलता,
तुमसे नहीं बनते वैसे परांठे।

अचानक मन चला गया फिर से अतीत में,
जब एक लॉन्ग राइड के बाद ....
कुछ पल साथ बिताने को,
एक गोभी का परांठा ...
ढाबे की अनहाइजिनिक सी टेबल पर,
लोकल टाइप के सॉस से ....
शेयर करके आधा-आधा खाते थे,
नहीं सोचते थे कुछ भी,
कुछ और समय साथ रहने को दूसरा परांठा आर्डर कर देते थे ...

उस बीच तेरी आँखों का मुझसे कुछ कह जाना,
और मेरे चेहरे पर छा जाना गज़ब सा उजास।
दिन ख़त्म हो जाता था साथ-साथ,
पर बातें थी कि ख़त्म नहीं होती थी।
फुर्सत के उन पलों  में जिए जो  दिन हमने साथ,
हाँ वो स्वाद उन दिनों का .......
उन "गोभी के परांठों" की तरह .....
आज भी भुलाए नहीं भूलता मुझे ...


Sunday, 16 December 2012

"ठिठुरता मन"


भीगा आँचल,सीला सा मन,
दृग अश्रु-गागर  भरमाये।।
धूप की प्रतीक्षा करते-करते,
सांझ की देहली पार कर आये।।
ठिठुरेगा मन आज भी यूँ ही,
दुःख के बादल हैं जो छाये।।
ढलता दिन कह रहा है तुझसे,
ओढ़ ले तू भी मिथ्या के साए।।
जीवन पथ ये कंटकमय है,
नीरव बस तू चलता जाए।।
आह जो निकली मन से तेरे,
जग तुझपे ही हसेगा कल को।।
उत्तरदायित्व वहन करने हैं तुझे तेरे,
प्रण कर उस पथ अग्रसर हो जा मन।।

Friday, 16 November 2012

"रूठे शब्द"

रूठे-रूठे अनमने से शब्दों को,
संजोने का साहस कहाँ से लाऊं।।

शुष्क जो अब हो चला है,
आँखों का तैरता पानी भी,
मन को छू जाए जो सबकी,
वो वेदना मैं कहाँ से लाऊं।।
शब्द जो रूठे हुए हैं,उनको कैसे मैं मनाऊं।

बिखरे-बिखरे से ख्यालों को,
बटोरना आसान नहीं है,
फिर भी कोशिश करता है मन,
कुछ तो आज समेटा जाए।।
शब्द जो रूठे हुए हैं,उनको कैसे मैं मनाऊं।

तिनका-तिनका जोड़कर,
जो नीड़ बनाया था कहीं,
आँधियों के कोप से तितर-बितर हो गया,
उसको फिर कैसे बनाऊं।।
शब्द जो रूठे हुए हैं,उनको कैसे मैं मनाऊं।

रूठे-रूठे अनमने से शब्दों को,
संजोने का साहस कहाँ से लाऊं।।

Friday, 26 October 2012

"कुछ ख़याल"



कुछ नज्में लिखने की कोशिश का रही हूँ, आपकी नज़र कर रही हूँ।

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ये गहराती शाम ..... करवट बदलती फिजा....
अंगडाई ले रहा मौसम...!!

तेरी राहों पे टिकी हुयी नज़रें ....
कानों को इंतज़ार तेरे क़दमों की आहटों का.....
वही सिलसिला कई सालों से.....
पर ये क्या ....!!
इन सिलसिलों के दरमियान .....फिजा की इन करवटों और मौसम की ली हुयी अंगड़ाईयों की तरह तुम्हारे दिल को बदलते हुए देखा है मैंने...
महसूस किया है उसकी हर अंगडाई को....
जो अहसास कराती रहती है मुझको तुम्हारे-मेरे...

बीच के बढ़ते हुए फासलों का हर दिन.... और एक बैचेनी सी छा जाती है दिलो-दिमाग पे .... ठीक उसी तरह जिस तरह से शाम गहराते ही बैचेन हो जाती हैं सागर की लहरें ...
बस उसी वक़्त से कोहरा छाने लगता है और धुंधला जाती हैं सब सुनहरी यादें....उन दिनों की,
जब थमता नहीं था सिलसिला तुम्हारे मेरे बीच सवालों-जवाबों का ... थमता नहीं था ख़्वाबों का कारवां..... रुकते नहीं थे कदम साथ चलते हुए कहीं..... और ख़याल तुझे मेरा और मुझे तेरा घेरे रहता था दिन-रात ....
और फिर आँखों से बरस पड़ता है ....सीली ठंडी हवाओं में वो कोहरा ओस बनकर .... उन यादों को भिगो देता है .... जो इन सिलसिलों में खो गयी हैं कहीं .... हाँ सिलसिले तो वही हैं .....!!
बस बदल चुके हैं "मैं और तुम" ... !!
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वक़्त ये भी गुज़र जाएगा.... हर उस लम्हे की तरह ...
जो गुज़र गया .....और छोड़ गया एक कसक सी दिल में ...
कुछ अनछुए अहसासों की, जिन्हें टकटकी लगाए देखते रहे बस और वक़्त ले गया साथ अपने उन अहसासों को भी... जिनकी यादों की टीस आज भी उठती है इस दिल मे.... उस सुनामी की तरह जो पलक झपकते ही तबाह कर जाती है सबकुछ जो पनप रहा है दिल की बगिया में कहीं ....
और फिर उजाड़ और बंज़र सी दिल की उस जमीन पर हवाओं के कुछ थपेड़े आते हैं .. जो अपने सीलेपन में समेटे हुए ले जाते हैं तेरी उन यादों और बातों को कहीं.... जिन्हें वक़्त की रफ़्तार की दौड़ती हुयी तेज़ नज़रों से बचकर चुरा कर रख लिया था अपने पास..... पर वक़्त भी बहुत निष्ठुर है....
दुष्ट ले ही गया आखिर उन्हें मुझसे छीनकर...... जिन यादों के कुछ फूल दिल की बगिया में महकने को मचल उठे थे.....

शायद वक़्त नहीं चाहता था की उसकी रफ़्तार से नज़रे चुराकर मैं उससे चुरा लूं तुम्हे....
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हाँ..........
हाँ,बोल रहे थे तुम और मैं सुन रही थी,
मगर उस बोलने और सुनने के बीच,
मीलों का सफ़र तय कर चुकी थी मैं।

पर जब रुका वो सिलसिला,
तो स्तब्ध सी अपनी ही धडकनों को गिनती,
वहीँ खड़ी थी,शायद शून्य ही चली थी मैं ।

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ह्रदय-कमल मुरझाया सा है,
और तुम पुनः तरकश भर लाये ,
आक्रमण करने को आतुर हो हर क्षण,
हे निष्ठुर तुमको तनिक दया न आये ????

शब्द-शर आघात करें जब,
कोमल ह्रदय छटपटा जाये,
अंतर्मन विचलित हो जाए,
नयन अश्रु-नीर बहायें।।

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हिसाब... (1)

सुनो !!


जानती हूँ मैं.... 
कि हिसाब के बहुत पक्के हो तुम,
पर ये क्या !!
रिश्तों का ही हिसाब कर डाला तुमने तो....
नहीं जानती थी कि प्यार में,
रिश्तों की अदायगी का भी कोई हिसाब होता है ,

अरे हिसाब की तो वैसे ही कच्ची हूँ ना मैं !!
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हिसाब.... (2)

बही-खाते थमा जाते हो...
लम्बे-चौड़े हिसाब के,
थामते हुए उन्हें आत्मा कंप सी जाती है,
दिल पर जमी सुर्ख लाल मिटटी का रंग,
देखते ही उसको....
आँखों में उतर सा जाता है,
निःशब्द अधर थर्राते हैं,
पर कुछ भी कह नहीं पाते हैं,
मौन ही सूचक होता है तब ,
ह्रदय में उठी उस पीड़ा का.....

रिश्तों का हिसाब किया तो तुमने,
बैठकर कुछ इंचों की दूरी से ....
पर इस हिसाब-किताब में
देखो ना!!
दिल मीलों दूर चले गए....

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हाँ ... विस्मृतियों के आकाश में भ्रमण करते तुम,
भूल चुके हो वो क्षण ...
आज भी जो अविस्मृत हैं मेरे लिए ....

उस आकाश से तुम्हे दिखाई दे जाएँ 
कभी यूँही ... 

"विस्मृतियों से तुम्हारे इस प्यार में ,उस आकाश तले ,
हम हो चले हैं नदी के दो किनारे!!"


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कई बार कहा दिल ने मेरे,
तोड़ दे नफरतों के ताले.... 
दिल पे जो लगा रखे हैं... 
पर हर बार तू उन्हें न तोड़ने की
एक नयी वजह दे गया !!


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धुंध में आँख-मिचौली करती,
धीमी गाड़ियों की पार्किंग लाइट्स ...

मंद गति से चल रही है जिंदगी भी ,
आगे कुछ भी नज़र ना आये .....
घनी बस्तियों में कराहती ,
चुभती ठंडी हवा पुरजोर ....
दिल में भी कुछ चुभ सा गया है,
इस बार की सर्दी में है बहुत जोर।। 



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फागुन की अंधड़ भरी बयार,
दस्तक दे रही है,
दरवाजों पे,खिडकियों पे !!
मेरे सवालों को न उड़ा ले जाए,
ये कहीं अपने साथ !!
कि कोई उलझा- उलझा सा रहता है,
आजकल उनमें,
धागों की तरह ..... !!


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क्यूँ !!

अगर गुड़ियों के साथ खेली है वो,
तो इसका मतलब ये तो नहीं,
कि वो भी एक गुडिया है ...... !!
मौन,
बेजान ..... !!

अरे ऐसा कैसे समझ लिया तुमने ????

वो तो शक्ति है,
सहनशीलता की मूर्ति है,
सृष्टि की ऐसी कल्पना है,
जिसके बिना तुम्हारा अस्तित्व शून्य है,

हाँ !!

उसे भी ये अहंकार है !!



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"पगडंडियाँ"

क़दमों की आहटें सुन फिजा महक जाती है .....
कदम बढ़ते जाते हैं और "पगडंडियाँ" बन जाती हैं .....


http://www.facebook.com/#!/pages/Pagdandiyan/367545386665536

छोर दिखे न उसका कोई,
डग-मग सी वो चलती जाए|
कहीं संभलकर सीधी चल दे,
जैसे रस्ता हमें दिखाए|
देह तोडती कहीं-कहीं पे,
टेढ़ी-मेढ़ी मुड़-मुड़ जाएँ|
लहराती हुयी चल दे अचानक से,
लरज-लरज वो शरमा जाए|
छुपन-छुपायी खेले कहीं पे,
इधर-उधर आड़ ले छुप वो जाए|

पगडण्डी ढूँढती बसेरा पल-पल यूँ ही
बढती जाए,
दिन ही ना गुज़रे ये लम्बा.....
हफ्ते,साल फुर्र से उड़ जाएँ .....|

Friday, 12 October 2012

" मेरी कल्पना का पारिजात"






सुलझे अनसुलझे से प्रश्नों की आंधी आती है !!
और मेरी कल्पनाओं के उस पारिजात के सारे पत्ते झड़ा जाती है। जिसमें अभी-अभी तुम्हारी स्मृतियों के पुष्प पल्लवित होने लगे थे।वृक्ष की कोपलों ने हरे-कच चमकीले पत्तों का आकार लिया ही था और उसकी शाखों  के सिरो पर नुकीली-नुकीली कलियों के गुच्छों में कुछ कलियाँ,श्वेत कोपलों और सिंदूरी वर्ण की शोभा से सज्जित सुंगंधित पुष्पों का रूप लेने के लिए रात्री की प्रतीक्षा कर रही थीं, आतुर थीं उन स्मृतियों की सुगंध बिखेरने को जो तुमसे मैंने उपहार स्वरुप पायी हैं।

 








चन्द्रमाँ की चांदनी बिखेरती हुयी यामिनी में जब रातरानी मुस्कुराती है,और कुमुद-कुमुदनी गाते हैं प्रेम के गीत, शीतल समीर बहती है मंद मुस्कान लिए, झींगुर के स्वर गूंजते हैं  निशा की गोद में।
ऐसे निरीह  वातावरण में कितना सुखद होता  तुम्हारी स्मृतियों की सुगंध में विलीन हो जाना,और सूर्योदय होते ही झर जाना निश्छल प्रेम के जैसे और बिखर जाना धरा पर हिमकणों के समान। शोभायमान कर देना उसको भी उस प्रेम की पराकाष्ठा की उस अद्भुत अनुभूति से,जो तुम्हारी स्मृतियों की सुगंध मात्र में विलीन होकर मैंने प्राप्त की होती।


कल्पना में ही सही ह्रदय को प्रेम की पराकाष्ठा की अनुभूति तो होती !!

अरे अभी तो पतझड़ आने में भी विलम्ब था !!
पर उस निष्ठुर आंधी ने जरा भी विचार न किया !!

हाँ निष्ठुर ही तो है,
जो प्रेम से ही अनभिज्ञ है।।
विदित नहीं जिसे,
मूक अक्षियों के आमंत्रण।।
ज्ञात नहीं जिसे अर्थ,
निःशब्द प्रेम  के वार्तालाप का।।
न सुन सके जो,
पलकों के उत्थान-पतन में निहित गाथा को।।
 नहीं पढ़ सके जो,
अधरों पर क्षत-विक्षत से पड़े वाक्यों को।।

तब से जब भी चलती है वह आंधी,
थाम लेती हूँ मस्तिष्क में ही उसको अपने।
ह्रदय तक पहुँचने ही नहीं देती उस निष्ठुर को !!
क्यूंकि  मेरी कल्पना के पारिजात के धवल पुष्पों को,
तुम्हारी स्मृतियों की सुगंध बिखेरना है अंतस में।।
और फिर प्रेम में तुम्हारे झर जाना है उन पुष्पों को,
समर्पित कर देना है अपने आप को तुम्हारे लिए।।

निः संशय यही प्रेम है !!

Sunday, 7 October 2012

"कमल का फूल"



अपने एक मित्र के एल्बम में ये कमल के फूल देखते ही मन खुश हो गया ... काशी-विश्वनाथ मंदिर के बाहर किसी दुकान पर रखे इन कमल के फूलों वाली एक फोटो ने मुझे अपने ऊपर नज़रें टिकाने को मजबूर कर दिया जैसे।

पता नहीं क्यूँ,बचपन से ही कमल के फूल से मुझे बहुत प्रेम है,देखते ही जैसे एक आनंद की लहर सी उठती है मन में।
और कमल,वो भी जो भगवान को चढ़ना हो सहसा ही आकर्षित का लेते हैं मुझे।
लगता है अभी लूं उसको अपनी हथेलियों में और निहारूं देर तक उसकी सुन्दरता को,निर्मलता को  उसकी बसा लूं अपनी साँसों में और महसूस करूँ उसके ह्रदय की असीम कोमलता को,मानो वो मुझसे बातें करने लगता हो।
अजीब सा प्रेम उमड़ पड़ता है मन में उसके आर्द्र से स्वभाव पर, जो मन को शीतलता देता रहता है।मन करता है बस यूँही निहारती रहूँ उसे,हाथों में लेकर,पर उसकी मंजिल तो कहीं और ही होती है।उसे तो भगवान के चरणों में अर्पित होना है।

बातों ही बातों में कहता है मुझसे फिर वो,कि भेंट कर दो मुझे उस इश्वर के चरणों में कि मेरा जीवन सफल हो जाए।
मुझे कुम्हलाने में वक़्त नहीं लगता,और तुम्हे भी तो मैं कुम्हलाया हुआ पसंद नहीं ना !!
बहुत हो चुकीं बातें अब,छोड़ आओ मुझे उस मंदिर में,
जहाँ जाकर मैं धन्य हो जाऊं !!

सकुचा जाती हूँ मैं तभी, कि कैसे कठोर हो गया अचानक वो कोमल सा कमल का फूल मेरे प्रति!!
फिर मेरा विवेक मुझसे कहता है, सही तो कह रहा है ये कमल का फूल।
और चढ़ा आती हूँ जाकर उसको भगवान के चरणों में,सोच लेती हूँ कि मेरा प्रेम उसके साथ भगवान तक पहुच गया,और खुश हो जाती हूँ।

उसका जीवन सफल हो जाता है,और मेरी आस्था  की सरिता को नया किनारा मिल जाता है। 
शायद वो आस्था ही है जो उस कमल के फूल से मुझे जोड़े हुयी थी।

सही ही कहा था उसने-"तुम्हे भी तो मैं कुम्हलाया हुआ पसंद नहीं ना !"

"यकीन"



सांझ का वो ढलता हुआ सूरज ..... देखती हूँ रोज़ मैं।
मिन्नतें करके कई रोकती हूँ,
रोज़ उसको कि मत जाओ।
मत छोड़ो मुझे अंधेरों के आगोश में, 
कि ये रात नहीं कटती मुझसे।

छोटी सी इक पहाड़ी के पीछे से झांकता हुआ वो कहता है।
कल आऊंगा फिर से,
इंतज़ार करना मेरा।
और फिर  चाँद भी तो आएगा,
कुछ उसको भी तो सताओ ना।

मैं सहम सी जाती हूँ सुनकर उसकी रोज़-रोज़ वही बात।
कितनी बार समझाऊं उसको,
की चाँद से मेरा झगडा है।
फिर चुपचाप हो जाती हूँ,
कह देती हूँ अलविदा उसे।

उस पर यकीन करती हूँ मैं क्यूंकि वो अपना वादा रोज़ निभाता है।
कुछ देर सो भी जाती हूँ ये सोचकर ,
कि  आकर मुझे जगा ही देगा वो।
 रात भी कट जाती है कुछ,
इसी यकीन के साथ सुबह के इंतज़ार में।

कुछ सुकून तो आता है दिल को उसके कहे उन लफ़्ज़ों से।
उसने वादा अपना आज तक तोडा नहीं,
रोज़ सुबह आ जाता है मेरी खिड़की पे।
मुस्कुराता हुआ और कहता है,
लो मैं आ गया फिर से।

हाँ यकीन का है हमारा रिश्ता जो कभी नहीं टूटेगा।
काश ये  यकीन  जीवन का हिस्सा बन जाए,
और साथ-साथ चले हमेशा।
फिर नहीं सताएगा मुझे ये चाँद कभी,
और नाही  अंधेरों का डर।

"नाटक-नींद और मेरा रोज़"

 
 
रात से लेकर सुबह तक,जो रिश्ता है मेरा नींद से,
उसे थोडा बहुत निभाने की कोशिश करती हूँ.... रोज़...
कई बार झगडती हूँ नींद से मैं... रोज़...
समझाती है एक ही बात मुझे वो.... रोज़...
फिर मना ही लेती है आखिर नींद मुझे .... रोज़....

"नहीं मुझसे प्रीत तुझे तो बिसरा दे खयाल ये तू....की
सपने आएंगे इन आँखों में मीठे से !!
 
कुछ हसाएंगे कुछ शायद रुला भी जायेंगे....
पर क्या तू रह सकेगी उन सपनों के बिना ????
जो तुझे तेरे अपनों से मिला लाते हैं....
कभी-कभी परीलोक की सैर भी करा लाते हैं....
और कभी आकाश में स्वतंत्र विचरने का मौका देते हैं...
भूलाकर इस दुनिया के झंझट सारे तुझे अपनी एक अलग दुनिया में ले जाते हैं.... "

नहीं...!!
नहीं रह सकती उन सपनों के बिना मैं....!!
गले लगा ही लेती हूँ फिर नींद को.... रोज़...
और कहती हूँ क्यूँ सताती है तू मुझे.... रोज़....
आती नहीं है आँखों में नखरे हैं तेरे.... रोज़...
फिर मना ही लेती है आखिर नींद मुझे .... रोज़....

"कैसे भूल जाऊं"

 
तुम कुछ कहते नहीं मुझसे कभी,
पर तुम इशारा करते हो मुझे की भूल जाओ....!!

अरे कैसे भुला दूं उन लम्हों को .... उन नजारों को ... उन शामों को... उन दोपहरों को.. उस सफ़र को.... उन बातो को...और उन यादों को... जिसमे जिए हैं हज़ारों युग जैसे,हज़ारों खुशियाँ जी हैं जिसमें.... जो आज भी दिल के किसी कोने में सहेजी हुयी है मैंने,बिलकुल वैसे ही जैसे तुम्हारे दिए हुए ग्रीटिंग कार्ड्स सहेज रखें है... मैंने अलमारी के कोने में बने हुए एक लोकर में ....जब कभी खोल लेती हूँ उस अलमारी को.... और तुमसे नज़रें चुराकर देख लेती हूँ..... उन सजे हुए से कागज़ के टुकड़ों को..... देखकर कुछ तसल्ली पाता है दिल.... की इनमे अभी भी सहेजा हुआ है मैंने कुछ अंश तुम्हारे प्यार का.... पर तुम्हारे लिए तो ये अब सिर्फ सजे हुए कागज़ के टुकड़े ही हैं शायद ...!!

खटखटाती हैं दिल के दरवाज़े अक्सर वो यादें .... मुझे याद दिलाती रहती हैं उन लम्हों की.... बार-बार... !!
जब तुम्हारी बाहों में मानो कायनात पा ली थी मैंने... तुम्हारी आँखों में मिल गयी थी पनाह.....
हर सौगात मेरे जीवन की तुम पर थी न्योछावर और हर आरजू मेरे दिल की तुम्हारे लिए थी पागल....

बेरुखी दिल ये मेरा तुमसे रख सकता नहीं,उसके लिए तो उसे पत्थर का बनना होगा....!!
फिर कैसे भूल जाऊं????

हाँ ये आँखें अब पथरा चुकी.... छुपकर रोते-रोते,तुम्हारी वापसी की राह तकते-तकते.. पर तुम तो बहुत दूर निकल चुके हो शायद.... की जहाँ से मुड़कर देखने पर भी मैं तुम्हें नहीं दिखाई दूंगी अब तो .....
वीरान सी उस राह पर भटक रही हूँ तन्हा अब.... चाहकर भी तुमको आवाज़ लगाना मुश्किल है.....
 

Friday, 28 September 2012

" जिंदगी...."




पलट पलट कर जब भी देखा है तुझे...
हर रंग में मुझे तू दिखी जिंदगी....
कभी हंसती हुयी....
कभी सिसकती हुयी.....
सिमटी हुयी ज़ज्बातों में कहीं....
कभी ठिठुरती हुयी रिश्तों की सीली सर्द हवाओं में...
तो जलती हुयी ख्वाहिशों की तपिश में कहीं...

बिखरती हुयी हालातों में कहीं...
कभी बहारों में संवरती हुयी....
कभी ख़्वाबों की दुनिया में उडती हुयी..
कभी मचलती हुयी अदाओं में भी देखा है तुझे...
और कभी बहते हुए पानी सी लगी है तू....

मेरे साथ है तू ही इस सफ़र में,अनजान से इस शहर में....
जहाँ अपने भी अजनबी लगते हैं,और हमसाए भी झूठे दिखते हैं....
इस तलाश में... इस ख़ामोशी की आवाज़ में... जो आती तो है लबों तक पर सुनाई नहीं देती... तू ही तो है मेरी संगिनी...
ऐ जिंदगी... ऐ जिंदगी....

Thursday, 27 September 2012

"वो पुराना रेशमी धागा"



जाना हुआ आज मेरा अचानक,उस पुराने से शहर में...
मोहल्ले की उस पुरानी गली में... तो याद आया की ये तो वही जगह है....
जहाँ इक पुराने से मंदिर के सिरहाने वाले पुराने से पीपल के दरख़्त की,सबसे ऊंची डाली के तने पर अपनी मन्नतों का रेशमी धागा बाँधा था कई साल पहले....
बिसरा दिया था जिसको मैंने ...
लपेटा था बडे जतन और उत्साह से कसकर,की कभी पकड़ न कमजोर हो इस विश्वास की.....
आज रंग ...

उस धागे का उड़ गया है,धुप और बरसात में... पर पकड़ आज भी उतनी ही मजबूत है मेरे उस विश्वास की.....
अहसास कराया उस पुराने रेशमी धाँगे ने आज मुझे,विश्वास अटल हो मन में जो,क्षति न कोई हो पाएगी तेरे अंतर संबल को...
मन्नतों में बांधे हुए उन रेशमी धागों को देख आँख ख़ुशी से भर आई मेरी.....
बिसरे हुए विश्वास को उस पुराने से शहर से,अपने संग इस नए शहर में लाकर ,बांधुंगी फिर से एक रेशमी धागा,अपने विश्वास का किसी दरख़्त पर .....

Wednesday, 26 September 2012

"ह्रुदय-विहंग"




जब जब मौन को विजय करना चाहा है,
शब्द फूट फूट कर निकसे हैं।
दबे हुए से भाव अंतस में कुलबुलाये हैं,
अधरों पर उमड़-उमड़ कर आये हैं।


कैसी विडम्बना है ये मानव मन की,
बंधन को छिन्न करने को त्वरित होता है।
सीमायें जब निर्धारित हो जाएँ,
सीमाओं की बाड़ नष्ट करने को आतुर रहता है।

द्वंद्व पाश में व्याकुल ह्रदय,
ज्यों आखेटक के पाश में विवश खग हो।
क्षण-क्षण छटपटाता व्यथित उर यों,
ज्यों पाश में खग अपनी वेदना को प्रकट करे।

स्वतंत्र पखेरू बन उड़ना चाहे मन-बावरा,
ऊंचे उस आकाश में क्षितिज की आस में।
वश में ना वो आना चाहे किसी भी मायाजाल के,
पंख पसारे ह्रुदय-विहंग गाये अपनी तान में।

नीरव कानन में राग नया कोई ढूंढें अपनी मस्ती में,
कोलाहल से त्रस्त हो गया मानवता की बस्ती में।
मन नहीं अब लगता उसका माया-मोह-प्रपंच में,
अंतर्द्वंद्व का अंत कोई हो,अंतर्द्वंद्व का अंत कोई हो।

Wednesday, 12 September 2012

"आक्रोश की अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के बीच की महीन रेखा"


[असीम त्रिवेदी- "आक्रोश की अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के बीच की महीन रेखा को समझने में नाकाम कार्टूनिस्ट...!!!!"
इनके देशभक्ति के ज़ज्बों को कई निगाहों से देखा जा रहा है.... युवा हैं,अगर खून में देश के लिए उबाल है तो अच्छा है.. परन्तु राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान कहाँ तक उचित है...????
या तो ये हीरो बनना चाह रहे हैं या कोई मुहिम छेड़ना चाह रहे हैं  ????
कई सवालों के निशाने पर.. देशद्रोह की कार्यवाही के निशाने पर...]

कई मित्रों के साथ इस विषय पर हुयी एक  चर्चा  के बाद मन में ख़याल आये कई...
आपके सामने रखना चाह रही हूँ...
पूर्ण चर्चा का निष्कर्ष निकला कि "हमारे नैतिक मूल्य और कर्तव्य, राष्ट्र / राष्ट्रीय प्रतीक / संवैधानिक  संस्थाओं के प्रति अपने नीति निर्देशक कर्तव्य  हमारे  लिए सर्वोपरि हैं ..."
हाँ मैं इस से पूर्णतया सहमत हूँ...

परन्तु एक निष्कर्ष और जो मैंने निकला वो यह है कि.. हमारे नेता तो इतने बेशर्म हो चले हैं कि उनके कार्टून्स बाज़ार में बिकते हैं.. इन्टरनेट पे प्रदर्शित होते हैं.. अखबारों में छपते हैं.. परन्तु वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आते... कुछ ज्यादा ऊपर-नीचे हो तो उसको प्रतिबंधित करवा देते हैं...
अफजल ,कसाब  और अमर जवान  ज्योति को लातोँ से तोड़ने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता कार्टून्स से....
कार्टूनिस्ट्स बस अपना काम करते रहते हैं... चाहे वो देशभक्ति के लिए हो या आजीविका के लिए... हम लोग देखकर ठहाके लगा लेते हैं... बस हो गया कार्टून का बनना सार्थक...
इतना ही है कार्टून का औचित्य सही मायनों में देखा जाए तो...

परन्तु असीम ने कार्टून कि दुनिया में एक नयी चुनौती को हमारे सामने लाकर एक ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है कि हम उसके औचित्य को समझे हैं... भले ही वो देशद्रोह का अपराधी हो परन्तु उसने अपने आक्रोश को जताया तो... हाँ एक युवा और देशभक्त होने कि वजह से वह आक्रोश कि अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता के बीच भेद नहीं देख पाया... गर्मजोशी से भरा हुआ उसका खून कह रहा है "कि मैं एक देशभक्त हूँ"

न जाने कितने लोग कुछ हमारे देश के अन्दर के और कुछ बाहर के रोज़ हमारे देश में देशद्रोह कर रहे हैं... बस तरीके अलग अलग हैं... पर देशद्रोह का मुक़दमा असीम पर जितनी तत्परता से चलाया जा रहा है असली देशद्रोहियों पर नहीं चलाया गया... क्यूँ?????
क्यूंकि "असीम त्रिवेदी" अपने आप को "देशभक्त" कह रहा है... और ये बताना चाह रहा  है कि किस तरह देश में इन राष्ट्रीय प्रतीकों कि आड़ में भ्रष्टाचार पनप रहा है..
परन्तु उसका तरीका गलत है...!!!!
मैं कतई इस बात से सहमत नहीं कि असीम त्रिवेदी ने जो किया वो सही है... हमारी चर्चा का जो निष्कर्ष है उस से मैं पूर्णतया सहमत हूँ...
हाँ असीम त्रिवेदी ने जो किया है उसमे अन्तर्निहित तथ्य सही है.. पर लहजा गलत...
हमारे देश के युवा खून को उस अन्तर्निहित तथ्य को जानने का एक बेहतर अवसर प्रदान किया है असीम त्रिवेदी ने.... बस तरीका सही और देश के हित में हो... तो हमारे युवाओं को जागृत करने के लिए ये एक अच्छा उदाहरण है...

Saturday, 8 September 2012

"कान्हा"

स्वर्णिम सुन्दर मोहक सूरत,
सलिल समान स्वच्छ  ह्रदय।।
कान्हा की है मन में मूरत,
सुलभ सनातन रूप लिए।।

अलख अनोखी जागी उर में,
दृग दर्शन की आस करें।।
बंसी बजैय्या रास रचैय्या,
प्रेम प्रीत सब तुम्ही मेरे।।
 




कंचन काया श्याम वर्ण प्रभु,
प्रकाश पुंज बन तमस हरें।।
आभा अंतर्मन में जागृत,
ज्यों मंदिर में ज्योति जले।।




कोमल कुमुद मुस्कान कलेवर,
अंधकार अंतस  का हर ले।।
मन मंदिर में बसो मनोहर,
श्वास श्वास अब पुकार करे।।

निर्मल निश्छल अद्भुत काया ,
त्वं त्वं  उर अब यही रमे।।
भक्ति भेंट करूँ चरणों में,
अनुग्रह अटल अनंत रहे।।

Sunday, 2 September 2012

'मैं-एक पहेली"

 
हाँ...!! अकेली हूँ मैं अकेली...
वैसे तो बहुत थीं मेरी सहेली...
पर वक़्त की ऐसी हुयी अठखेली...
की मैं बस एकांत में ही खेली....
प्रकृति को निहारती घंटो बैठी अकेली ...
छत पर सुलझाती उलझी हुयी चमेली...
हंसती और बतियातीं मुझसे हर कली....
कभी पकड़ती बागों में उडती तितली.....
देखती आकाश में तारों की आँख मिचोली....
कभी कभी सूझती मुझको भी कोई ठिठोली....
बस बैठ जाती कागज़ कलम के साथ एकली...
अपनी मेज़ पे बैठी बनाती शब्दों की रंगोली...
कई बार शब्दों के प्रेम में जली चाय की भी तपेली....
एक दिन सहसा मैं खुद से ही बोली....
अकेली होकर तू बन गयी खुद भी एक पहेली.....

Monday, 20 August 2012

"पलाश"

भोपाल मध्य प्रदेश की राजधानी है।मैंने इंजीनियरिंग भोपाल से ही की,वहां 4 वर्ष रही। वहां की प्राकृतिक सौन्दर्यता भुलाए नहीं भूलती।वैसे तो फाल्गुन मास  में झीलों के शहर भोपाल में जहाँ-तंहा पलाश की बहार देखने को मिलती है। कॉलेज के दिनों में मेरे कमरे के बाहर एक पलाश का वृक्ष हुआ करता था ..... मुझे उसके फूल अपनी किताबों में सहेजना बहुत अच्छा लगता था। एक बार होली पर मैं अकेली अपने कमरे की खिड़की पे बैठे किताबों के पन्ने पलट रही थी, कि अचानक एक शुष्क पलाश का फूल मुझे मिल गया। न जाने कब से सहेजा था। बस अपनी कलम से मन की बातें पन्नों पे उतर दी, और बन गयी "पलाश"........





फागुन आया है,होली लाया है,
वृक्षों पर सुन्दर पलाश मुस्काया है,
ये पलाश सुमधुर सी स्मृति लाया है,
क्यूंकि आज एक शुष्क
पलाश मैंने अपनी किताब में पाया है.......

ये पलाश मुझसे बार-बार प्रश्न कर रहा है,
रंग मेरे केसरी भरने क्यूँ न कोई आया है,
क्यूँ पूर्ण चन्द्रमा की चांदनी धूमिल सी लग रही है,
क्यूँ चंचल किरणे इस चाँद की उदास सी लग रही हैं..........

शायद पलाश का मन कुछ शंका से भरमाया है,
जाने किसकी आस में पलाश ऐसे सकुचाया है,
कैसे कहूँ की पलाश का मन उसे पुकार रहा है,
इस इन्द्रधनुषी होली में मेरी किताब का पलाश बस रोया है.......

Wednesday, 15 August 2012

"अनकही"

कभी थी हिरनी अपने वन की,
फुदकती ही रहती थी।
आज थमी-सी उसकी चाल है....

कभी चहकती चिड़िया जैसी,
कलरव गुंजन करती थी।
आज रुंधी-रुंधी आवाज़ है....

कभी वो जल की मछली जैसी,
मचलती ही रहती थी।
आज लगता टूटा उसका बाँध है....


 जंजीरों से जकड़ी-जकड़ी,
लगती है वो बिखरी-बिखरी।
मुख पे झूठी-सी मुस्कान है....

 सबके लिए संपूर्ण बनी,
अपने लिए रह गयी अधूरी।
आज यही उसकी पहचान है...

 सीमाओं की बाड़ बंधी,
मर्यादाओं की आड़ लगी।
आज बंधन ही उसका मान है.....


कोशिश फिर भी खुश रहने की,
रूठ कर फिर खुद मनने की।
आज उसकी यही बिसात है....

 खुली नहीं फिर भी मुट्ठी उसकी,
बात छुपी है जिसमें गहरी।
आज सहनशक्ति उसकी आन है...

 फिर भी है सब से अनजानी ,
क्यूँ है अनकही-सी उसकी कहानी ??
आज सोचकर भर आई उसकी आँख है.....


Monday, 13 August 2012

"समर का शंखनाद "

कुछ पंक्तियाँ लिख रही हूँ ..... उत्साह ,वीर और रौद्र रस से भरी हुयी ....
थोड़ी ज्वाला प्रज्वलित करने की कोशिश कर रही हूँ।
आशा करती हूँ ,आपको पसंद आएगी .....
संकटों की है घड़ी,अग्नि का संचार हो...
धरा पुकार कर रही,संघर्ष का प्रसार हो....
सुशुप्त क्यूँ  है हो चली,रग-रग में  आज ज्वाल हो...
है भारती पुकारती,समर का शंखनाद हो....


क्यूँ दहाड़ मंद हो गयी,सिंह गर्जना करो....
क्यूँ श्वास क्षीण हो रही,शक्ति का प्रवाह हो.....
क्यूँ एकता बिलख रही,मैत्री अब प्रगाढ़ हो.....
है भारती पुकारती,समर का शंखनाद हो....


क्यूँ स्पंद मंद हो रही,साहस अब अपार हो..
क्यूँ चाल है भटक रही,प्रखर दिशा प्रकाश हो.....
क्यूँ माला है बिखर रही, सेना अति विशाल हो.....
है भारती पुकारती,समर का शंखनाद हो....


हिमालय पे आंच आ रही,अब रक्त में उबाल हो....
मानवता बाट जोह रही,अडिग तेरा प्रयास हो...
उत्साह में ना  हो कमी,सफलताओं का अब त्यौहार हो....
है भारती पुकारती,समर का शंखनाद हो....


प्रखर प्रचंड सूर्य की,पहली वो किरण बनो...
माता प्रताप दे रही,भुजाओं में बल अपार हो...
शक्ति प्रदान कर रही,मन में अब विश्वास हो....
है भारती पुकारती,समर का शंखनाद हो....

" भारत माता की जय - जय हिंद "

Sunday, 12 August 2012

"आज़ादी"-स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं के साथ



स्वतंत्रता दिवस के अवसर पे मुझे बचपन में पढ़ी हुयी माखनलाल चतुर्वेदीजी  की कविता "पुष्प कि अभिलाषा से" कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं......
 
"चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ
चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पर जावें वीर अनेक ।।"
 
पर आज की परिस्थितियों को देखकर लगता है की ये कविता सभी को फिर से पढाई और समझाई जानी चाहिए....
 सही मायनो में आज़ादी से हम वंचित हैं...
मन व्यथित है...  हालातों को देखकर..... पता नहीं क्यूँ मुझे आज़ादी का जश्न मनाते हुए अच्छा नहीं लग रहा .....
बस उन बलिदानों को याद करने का दिन है.... सही आज़ादी अभी कोसों दूर है...
 
 
 
समुन्दर की गहराई को उसने क्या जाना है,
जिसने कभी उसमें गोते ना लगायें हों....
और वतन के लिए दी गयी मौत क्या होती है ये उसने क्या पहचाना  ,
जिसने इस मातृभूमि के लिए कभी एक खरोंच भी न खायी हो....
 
हे देश को चलाने वालों सुन लो रो रही भारत माता आज,
उसकी चीख पुकार को क्या जाने तुम्हारा राजनीति का बुखार.....
जिसने देखा वीर भगत सिंह-सुखदेव  और राजगुरु का बलिदान,
झाँसी की रानी ने भी जिसके लिए दे दिए अपने प्राण....
क्यों हरे कर दिए तुमने आज उस माता के घाव,
जंजीरों में पाया है उसने खुद को फिर से जकड़ता आज .....
 
जिसके लिए मर-मिटे देश के वीर-जवान,
गद्दारों के तुमने वहां आशियाँ बनाये हैं.....
जिसने खोये देश के लिए अपने गोद के लाल,
उनकी कुर्बानी पर प्रश्न-चिन्ह लगाये हैं....
 
क्या जानो तुम खून की होली क्या होती है,
तुमने तो बस अपनी जीत की होली ही खेली है....
राज चला कर इस धरती पे कितने खून बहाए हैं,
लूट-लूट कर पैसा तुमने अपनी तिजोरी के रुपये बढ़ाये हैं....
 
आज़ादी का मतलब क्या है,
संसद की बहस ये क्या जाने.....
आरोप-प्रत्यारोप की होड़ है,
भारत माता के दुःख को कौन पहचाने....
कश्मीर से कन्या कुमारी तक,
कहते हैं हमारा राज है....
पर सही मायनो में देखा जाए तो,
फैला अराजकता का संसार है.....
किसे पड़ी है उन बलिदानों की,
वो तो बस अब नाम हैं....
बना दी हैं ऊंची इमारत आज,
पर हिल गयी बुनियाद है.....
 
अपनी माता के अश्रु देखकर,
खून न गर जो खौला आज....
उसका रुदन-विलाप सुनकर,
मन का कोना-कोना ना जो दहका आज....
तो व्यर्थ है इस आज़ादी का जश्न,
व्यर्थ है ये मानव जीवन....
धरा कर रही हमारी पुकार,
क्रांति का बिगुल थामे कोई तो आज.......
सांकेतिक आज़ादी  की कैद नहीं चाहिए,
आओ करें फिर भारत माता को आज़ाद......
 
"भारत माता की जय"

Friday, 10 August 2012

"मेरी परछाई"

आज वाकया कुछ ऐसा हुआ साथ मेरे ,
अपनी परछाई से ही डर बैठी मैं.....
ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था साथ मेरे,
क्या डर सताया मन को आज जो सकपका गयी मैं.....??????
क्या कोई अपना नहीं है साथ मेरे,
जो इस तरह घबरा गयी मैं......????
उथल-पुथल में उलझा है मन...
जाने कौन व्यथा घेरे है इसको...
शंका के बादल छाये हैं हर क्षण...
जाने कौन बयार थामे है इनको.....
काश के माँ का आँचल होता,
फूट-फूट कर मैं रो लेती.....
चाहे उलझन का कोई हल न मिलता,
मन थोड़ा हल्का कर लेती......
कुछ कम हो जाती व्याकुलता,
गोदी में रख के सर सो लेती.....
रात घनेरी हो चली है अब तो,
मेरा डर बढ़ता ही जाए,
कान्हा तू ही आजा अब तो,
संबल अब टूटा सा जाए,
आकर कुछ तो आस बंधा दे,
थोड़ा सा विश्वास जगा दे,
मन का दूर अँधेरा कर दे...
मेरी व्यथा का कुछ तो हल दे.......

Thursday, 9 August 2012

"श्री कृष्ण-जन्माष्टमी" - शुभकामनाएं



कृष्ण , कन्हैय्या ,गोपाल ,गोविन्द ,मुरलीमनोहर ,मनमोहन ............
कितने सारे नाम तुम्हारे.....
किस नाम से पुकारूँ हे कान्हा तुम्हे मैं,
हर रूप में तुम हो मुझको प्यारे........
रूप मनोहर काया सांवरी,
हर लेती मन के संत्रास सारे  ......


वृन्दावन की गलियों से अब तो,
हो चला मुझको अतीव प्रेम है....
जी करता रह जाऊं वहीं मैं,
तेरी छाया फैली जहाँ चहुँ ओर है.....
कितना सरल सुन्दर जीवन है,
शांति वहां अपार है.....

आया दिन कृष्ण-जन्माष्टमी का....
लाया कई स्मृतियाँ भी साथ......
माँ के हाथ के बने वो लड्डू,
और वो पंच मेवे का प्रसाद......
गली-नुक्कड़ की वो मटकियाँ,
और वो पंचामृत का सैलाब....
याद है मुझको कान्हा अब भी,
तुम्हारे जन्मोत्सव का वो उत्साह.....


कमलनयन!! हे मीरा के गिरिधर,
आकर्षण तुम्हारी मंत्रमुग्ध मुस्कान है ....
पद्मनाभ!! हे पुरुषोत्तम तुम,
जग के तारणहार हो .......
कमलनयन!! हे माधव सुन लो,
तुम बिन ना उद्धार है ....
लक्ष्मीकान्तं !! हे सुरेशं तुमको,
मेरा शत-शत प्रणाम है .....


"जय श्री कृष्ण"

Wednesday, 11 July 2012

"समाकलन" (Integration)

गणित हमेशा से ही  मेरा पसंदीदा विषय रहा है,
अध्ययन के लिए मैंने यही विषय चुना,और मेरी गणित विषय में अति रुचि होने की वजह से हमेशा ही गणित की अच्छी विद्यार्थी मानी जाती थी।
मुझे  "समाकलन " में बड़ा ही मज़ा आता था.....

जीवन की इस उथल-पुथल में मैंने सोचा क्यूँ न जीवन को थोड़ा गणित से जोड़ा जाये .... और समाकलन जीवन से मिलता जुलता भी है। 
कहते हैं , जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है .... और जन्म से मृत्यु  तक  संघर्षों के समाकलन का प्रतिफल ही तो जीवन है।

बस बन गयी एक कविता समाकलन को जीवन से जोड़कर.....
प्रस्तुत है आपके समक्ष।



बहुत पढ़ा है गणित मैंने,
पर पढ़ न सकी जीवन का गणित।
जन्म से लेकर मृत्यु तक,
जीवन संघर्षों का समाकलन है।

संघर्षों का समाकलन होता है जब,
समीकरण जीवन की बनती है तब।
संघर्षों का समाकलन करते-करते,
बढ़ती ही जाती है जीवन की समीकरण।

कुछ चर  जुड़ते हैं,कुछ अचर जुड़ते हैं,
बस बढ़ती जाती हैं उलझनें कईं।
हित करता है कोई,कोई करता अनहित,
फिर मन चाहता है कर दूँ अवकलन*।

पर समीकरण तोड़ी जो मैंने,
कई जीवन बिखर जायेंगे।
कर नहीं सकती अब अवकलन,
किया तो बहुत पछ्ताउंगी।

ये तो है जीवन का गणित,
जिसमें पीछे जाना मुश्किल है।
चाहे बुरे हों , चाहे अच्छे,
उन चर-अचरों संग जीना है।

समीकरण बन चुकी है जो अब,
उसको ही लेकर आगे बढ़ना है।
समाकलन ही समाकलन है,
अवकलन का तो विकल्प ही नहीं अब।

गणित की भाषा किताबों में रह गयी,
जीवन का गणित जब समझ में आया।
बहुत पढ़ा है गणित मैंने,
पर पढ़ न सकी जीवन का गणित।

*अवकलन (Differentiation)  - समाकलन का विपरीत अवकलन होता है,जिसमे समीकरण घटती जाती है।